व्हाटअप्प ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहाँ क्लिक करे 👉
---Advertisement---

दिल्ली के लाल किला मैदान में जनजातीय महासमागम: सांस्कृतिक अस्मिता और मूल परंपराओं को बचाने की गूंजनई दिल्ली:

On: Thursday, May 28, 2026 8:15 AM
---Advertisement---

देश की राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला मैदान 24 मई 2026 को एक अभूतपूर्व राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक समागम का गवाह बना। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ और ‘जनजाति जागृति समिति’ द्वारा आयोजित इस ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ में देश के कोने-कोने से आए 500 से अधिक जनजातीय समुदायों के लगभग डेढ़ लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। इस महासमागम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
इस आयोजन के दौरान सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक जनजातीय अस्मिता, संस्कृति और अपनी मूल जड़ों (सनातन परंपराओं) से जुड़ाव को लेकर बेहद मुखर संदेश दिए गए।
“हम महादेव के वंशज”: संस्कृति और परंपरा पर बल
महासमागम के दौरान देश के विभिन्न अंचलों से आए जनजातीय प्रतिनिधियों और विचारकों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य और लोकगीतों के जरिए वनवासी समाज की अटूट आस्था को प्रदर्शित किया। इसी कड़ी में जनजातीय समाज की सांस्कृतिक और वैचारिक मुखरता को रेखांकित करते हुए प्रमुख सामाजिक-राजनैतिक विमर्शों में यह बात पुरजोर तरीके से उठाई गई:

“हम महादेव के वंशज हैं। जो महादेव का नहीं, वो हमारे जात का नहीं।”

भारतीय जनता पार्टी ( BJP)
महाराष्ट्र प्रदेश सचिव : श्री संतोष शिवराम जनाठे

यह वक्तव्य जनजातीय समाज के भीतर अपनी मूल वनवासी संस्कृति, प्राचीन आस्थाओं और भगवान शिव (महादेव) के प्रति उनके ऐतिहासिक व अटूट जुड़ाव को दर्शाता है। इस संदेश के माध्यम से समाज को अपनी मूल पहचान और पूर्वजों की परंपराओं के प्रति जागरूक रहने का आह्वान किया गया है।

“तू मैं एक रक्त”: राष्ट्रीय एकता का विराट संदेश

इस ऐतिहासिक समागम का मुख्य नारा ‘तू मैं एक रक्त, वनवासी-ग्रामवासी-नगरवासी, हम सब भारतवासी’ रहा।
सांस्कृतिक वैभव: समागम की शुरुआत दिल्ली के 5 अलग-अलग ऐतिहासिक स्थानों (राजघाट चौक, रामलीला मैदान, अजमेरी गेट चौक, कुदसिया बाग और श्यामगिरी मंदिर) से निकाली गई भव्य शोभायात्राओं के साथ हुई, जो पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर थिरकते हुए लाल किला मैदान में आकर विसर्जित हुईं।
अस्मिता की रक्षा: कार्यक्रम के मंच से वक्ताओं और देश भर से आए प्रतिनिधियों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि जनजातीय समाज की पहचान उनकी प्राचीन संस्कृति, जल-जंगल-जमीन से जुड़े संस्कारों और मूल आस्थाओं से है। यदि संस्कृति सुरक्षित नहीं रहेगी, तो अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जाएगा।

वैचारिक मंथन और राजनैतिक हलचल

इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के एक बड़े अभियान के रूप में देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी #जनजातीसांस्कृतिकसमागम, #आदिवासीअस्मिता और #जयमहादेव जैसे डिजिटल ट्रेंड्स के जरिए इस संदेश को देशव्यापी पहचान मिली है, जो आने वाले समय में जनजातीय विमर्श और सामाजिक-राजनैतिक दिशा को एक नया आयाम देने का संकेत दे रहे हैं।

Join WhatsApp

Join Now

---Advertisement---