पालघर | जिले के मनोर ग्रामीण अस्पताल में हाल ही में घटी एक दर्दनाक घटना ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत उजागर कर दी है। 22 वर्षीय प्रीति जाधव नामक महिला की प्रसव के बाद हुई मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था की लापरवाही और मूलभूत सुविधाओं की कमी पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
जानकारी के अनुसार, प्रसव के दौरान प्रीति जाधव को अत्यधिक रक्तस्राव हुआ। गंभीर स्थिति में होने के बावजूद मनोर ग्रामीण अस्पताल में न तो रक्तस्राव रोकने की आवश्यक सुविधा थी, न ही पर्याप्त चिकित्सीय संसाधन। मजबूरन महिला को सिलवासा सरकारी अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन रास्ते में उपचार में देरी और आवश्यक एम्बुलेंस सेवा (108) न मिलने के कारण उनकी मौत हो गई।
मृतका के पति ने अस्पताल प्रशासन और संबंधित डॉक्टरों पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की है।
इस मामले में स्थानीय विधायक विलास तरे ने भी हस्तक्षेप करते हुए स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर से मुलाकात की और संबंधित डॉक्टरों व अस्पताल कर्मियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने मनोर ग्रामीण अस्पताल को “मौत का केंद्र” करार देते हुए कहा कि यहाँ ऑक्सीजन, जीवनरक्षक उपकरणों और एम्बुलेंस जैसी मूलभूत सुविधाओं का गंभीर अभाव है। साथ ही उन्होंने मृतका के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देने और मनोर परिसर में ट्रॉमा केयर सेंटर शुरू करने की मांग भी की है।
यह घटना पालघर जिले में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ताहाल स्थिति का स्पष्ट उदाहरण है। ग्रामीण क्षेत्रों में हर साल ऐसे अनेक मरीज आवश्यक सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक ग्रामीण अस्पतालों को आधुनिक चिकित्सा उपकरणों, प्रशिक्षित डॉक्टरों और आपातकालीन सेवाओं से सुसज्जित नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी त्रासदियाँ दोहराती रहेंगी।
यह घटना केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की विफलता की कहानी कहती है — अब सवाल यह है कि क्या शासन व प्रशासन इससे सबक लेकर सुधार की ठोस पहल करेगा?
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